वर्ल्‍ड इम्यूनाइजेशन वीक पर बच्चों की सेहत के रखवालों को आप भी किजिए सलाम…

वर्ल्‍ड इम्यूनाइजेशन वीक पर बच्चों की सेहत के रखवालों को आप भी किजिए सलाम…

भारत का रोग प्रतिरोधक टीकाकरण कार्यक्रम दुनिया का सबसे बड़ा है। इसमें तकरीबन 26 लाख से अधिक नवजात शिशू और तकरीबन तीस लाख गर्भवती महिलाएं शामिल हैं। तमाम प्रगतिशीलता के बाद भी आज भी तकरीबन 38 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण जन्म के पहले साल में नहीं हो सका है। इसकी वजह है देश के कुछ हिस्से भागोलिक रूप से काफी जटिल हैं और वहां तक पहुंचना आसान नहीं है। न केवल भौगोलिक बल्कि ऐसे कई सुदूर इलाके हैं जहां कई रूढिय़ां हैं जो ऐसी प्रगतिशील योजनाओं को सिरे से नकार देती हैं। विरोध करती हैं। जब यहां हेल्थ वर्कर्स आ जाएं तो उन्हें नफरत भरी निगाह से देखा जाता है। आदिवासी बहुल इलाके हैं जहां बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध है। वे टीकाकरण को ईश्वर के खिलाफ मानते हैं और ये भी टीका लगाने का साइड इफेक्ट होता है। इन बाधाओं की वजह से बच्चे अच्छी सेहत से महरूम हैं। कह सकते हैं भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण मंत्रालय का कार्य काफी दुरूह है। इस हफ्ते मंत्रालय ‘वर्ल्‍ड इम्यूनाइजेशन वीक’ (24-30 अप्रैल) मना रहा है। इसकी थीम है- ‘प्रोटेक्टेड टुगेदर-वैक्सीन वर्क’।

उनके इस काम को इस काम को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी था कि इसमें वे कार्यकर्ता जुड़ें जिन्हें भारत की भौगोलिक और सामाजिक जटिलताओं को समझने और जूझने की क्षमता हो। इस साल मंत्रालय को ऐसी ही तमाम मुश्किलों के बाद भी अपना लक्ष्य तय कर सकने वाले कार्यकर्ता मिले जिन्होंने ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ कर, नदियां पार कर, लंबी पैदल यात्राएं कर सुदूर इलाकों में जाकर अपना मिशन पूरा किया है। नाव से कभी साइकिल से तो कभी नंगे पैरों से उन इलाकों में पहुंचते हैँ जहां पहले ही तमाम मुश्किलें उनकी बाट जोह रही थीं लेकिन उन्होंने हिम्मत न हारकर इम्यूनाइजेशन का काम पूरा किया।

गालियां खाईं, नफरतें झेलीं-  महिलाएं इस खास मिशन में काफी सक्रिय रहीं। ऐसी ही दो महिलाएं हैं मीना कुमारी और निरमा देवी। मीना कुमारी ग्रामीण हेल्थ वर्कर हैं और निरमा आशा वर्कर। हिमाचल प्रदेश की इन दोनों महिलाओं ने मिलकर उस काम को अंजाम दिया जो सामान्य लोगों के लिए मुश्किल होता। यहां ‘मलाना’ नामक एक छोटे से लेकिन प्रसिद्घ गांव में बाहरियों के खिलाफ डटकर खड़े होते हैं स्थानीय। ‘मैंने इस गांव के बारे में खूब सुना था कि लोग मुख्यधारा से दूर हैं। ये बाहरियों को नफरत से देखते हैं। उन्‍हें मार भी देते हैं। फिर भी सोचा काम है तो करना ही होगा। जो होगा देखा जाएगा सोचकर यहां आ गई।  मुझे स्थानीय निरमा देवी नामक आशा कार्यकर्ता का साथ न मिला होता तो इस चुनौती को पूरा नहीं कर पाती। टीका के लिए जाती थी तो बच्चों को लेकर महिलाएं भाग खड़ी होतीं और दूसरे लोग मुझे जमकर कोसते, गालियां देते।

चार इलाकों में टीकाकरण-  ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे धुब्री शहर है। यह एक ऐतिहासिक शहर है जिसे पश्चिमी असम का गेटवे यानी प्रवेशद्वार माना जाता है। इसे नदियों का मिलन स्थल भी माना जाता है। यह ब्रह्मपुत्र और मोरा से तीन तरफ से घिरा है। इस इलाके में पिछड़ी आबादी काफी अधिक है। यह पूरा इलाका स्थानीय भाषा में चार कहलाता है। यहां दूसरे क्षेत्रों से तुलना करें तो हेल्थ वर्कर्स के टीकारण कार्यक्रम का लक्ष्य पूरा करना आसान नहीं। दरअसल, व्यावहारिक रूप से यहां सड़क नहीं है और नावें भी नहीं हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि पैदल या केले के पत्तों से बनी अस्थायी रास्ते से गुजरकर कैसे सुदूर इलाकों में पहुंच सकते हैं।

यहां जूट की बहुतायत है इसलिए यहां अक्सर जूट के पौधों को पानी में तैरते देखा जा सकता है। ये काफी सहायक होती हैं नदी पार करने में। मुश्किलें पड़ जाएं तो ये तैरते जूट के पौधे बड़े मददगार होते हैं। तापमान की बात करें तो यह भी अत्यधिक नमी वाला होता है। यहां आशा वर्कर और हेल्थ वर्कर ने सुदूर क्षेत्रों में न केवल समुदायों को एक साथ लाने का काम किया बल्कि जन्म से पहले होने वाले मृत्यु दर को भी रोका। मीसल्स रूबेला कैंपेन के तहत असम के सभी बच्चों को जो 9 माह से 15 साल तक के हैं को टीका दिया जा रहा है।

सराहें इस समर्पण को-  गोलकगंज ब्लॉक पब्लिक हेल्थ सेंटर यानी बीपीएचसी की स्थापना 1905 में हुई थी यानी बंगाल के विभाजन के समय। इतने पुराने सेंटर को बहुत मेंटेन रखा गया है। यहां पर कोल्ड चेन पॉइंट है जहां पर रूबेला और मीजल्स से जुड़े टीकों को सहेज कर रखा गया है। 55 वर्षीय जलील शेख यहां से सुबह नौ बचे टीका पेटी को उठाकर अलग अलग डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर पहुंचाने का काम करते हैं। वे यहां के लोकल मार्केट में दिहाड़ी करते हैं पर आज इस काम को करते हुए गर्व महसूस करते हैं। वे कहते हैं, काम आसान नहीं। दिनभर कड़ी मशक्कत कर सेंटर पर पहुंचाने का काम करते हुए यही लगता है कि अपने समाज के लिए कुछ करने का अवसर मिला है।

केवल जलील नहीं, यहां की आशा वर्कर्स को भी लगता है कि इस काम में भले ही लगातार चलना पड़ता है। लोगों से मिन्नतें करनी पड़ती है। बच्चों की सेहत के लिए लड़ाई है यह जो खुद अभिभावकों को समझाना पड़ता है लेकिन इससे फर्क नहीं पड़ता उनके मिशन या समाज के इस पाक काम को पूरा करने के जज्बे पर।गोलकगंज की ही रहने वाली आशा वर्कर अबॉरन कहती हैं, ‘यदि हम इस काम को नहीं करेंगे तो कौन करेगा। हम इसी गांव से हैं, हमारा फर्ज बनता है कि अपने बच्चों की खुशहाली की जिम्मेदारी अपने हाथ लें। उल्लेखनीय है कि वे एक विधवा हैं और पांच बच्चों को पाल और बड़ा कर रही हैं।

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